भारत में कितने प्रकार के लॉ या कानून है.
भारत की न्याय व्यवस्था विश्व की सबसे अलग और अनूठी न्याय व्यवस्था है, भारत की न्याय व्यवस्था का ध्येय है कि भले ही 100 अपराधी बच जाए लेकिन 1 भी निर्दोष फंसने ना पाए... शायद इसी वजह से भारत की न्याय व्यवस्था इतनी लचर और ढुलमुल दिखती है... न्याय प्रणाली में अलग अलग कानूनों की अपनी शब्दावली है जो किसी को भी भुलभुलैया सी लगती है... जैसे आईपीसी, सीआरपीसी, एक्ट या सेक्शन... ये आर्टिकल इनके बारे में ही है...
एक्ट या अधिनियम
एक्ट या अधिनियम, लोकसभा और राज्यसभा में पास हो जाता है और बाद में राष्ट्रपति की अनुमति मिल जाती है तो वो एक्ट या अधिनियम कहलाता है... जैसे CAA या कृषि बिल...!
कोड या संहिता
कोड या हिन्दी में संहिता, ये पहले से बना हुआ होता है, ऐसा लॉ सिस्टम जिसे संगठित करके वापस कानून बना दिया जाता है, उसे कोड कहते हैं... जैसे इंडियन पीनल कोड या भारतीय दण्ड संहिता और मोरल कोड ऑफ कंडक्ट या आचार संहिता.
आर्टिकल या अनुच्छेद
भारत का संविधान अलग अलग भागों में विभाजित किया गया है, ताकि कोई भी कानून ढूंढने में परेशानी ना हो... संविधान के इन्हीं पॉइंट्स को ही आर्टिकल या अनुच्छेद कहा जाता है. वर्तमान में भारत में 470 आर्टिकल या अनुच्छेद हैं.
सेक्शन या धारा
एक्ट या कोड के क्षेत्र को डिस्क्राइब करने के लिए सेक्शन या धारा या उर्दू में दफा... वर्तमान में भारतीय संविधान में 570 धाराएं हैं...!
कानून के प्रकार या Types of Law
भारत में सबसे बड़ा तो संविधान ही है, लेकिन संविधान में भी अलग भाग है, जिन्हें समझना चाहिए...
भारत में जो भी कानून बनाए जाते हैं वो संविधान के अनुसार ही होते हैं, लेकिन कई बार ऐसे कानून बनाए जाते हैं जो किसी आर्टिकल या अनुच्छेद का उल्लंघन करते हैं, जो नकार दिए जाए हैं,
संविधान में दो तरह के कानून होते हैं...
- क्रिमिनल लॉ
- सिविल लॉ
क्रिमिनल लॉज
पुलिस द्वाारा लागूू किए जाते हैं, इनमें IPC या CrPC लागू होती है, आईपीसी वो बुक है जिनमें सभी आपराधिक धाराओं के बारे में उल्लेख किया गया है. सीआरपीसी वो बुक है, जिनमें किसी आपराधिक मामले में व्यक्ति को सजा मिलने तक क्या प्रोसीजर फॉलो किया जाए, उसका उल्लेख किया गया है. जैसे किस प्रकार गिरफ्तार किया जायेगा, किसी तरीके से सुनवाई होगी, किस प्रकार जमानत होगी या किस तरीके से सजा दी जाएगी...!
सिविल लॉज
सिविल लॉ में वो सभी मामले आते हैं जो आपराधिक मामले नहीं होते, जैसे संपति से जुड़े मामले, कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े लॉज, शादी विवाह से जुड़े लॉज, हिन्दू लॉज, मुस्लिम लॉज आदि...इन मामलों में सीपीसी या सिविल प्रोसीजर कोड होता है... सिविल लॉज में जेल नहीं होती, सिर्फ जुर्माना होता है, लेकिन जुर्माना नहीं भरा जाए तो जेल हो सकती है.
कॉमन लॉज या सामान्य कानून
ये वो कानून है जो किसी पुराने मुकदमे में दिए गए निर्णय से निकाल जाते हैं... जैसे सुप्रीम कोर्ट या किसी हाई कोर्ट ने किसी वैसे ही मामले में क्या निर्णय दिया और किन धाराओं में दिया वो ही उस मामले में लगाया जाता है. ऐसे मामलों में निचली अदालतें उस मामले को रेफरेंस करते हुए उस मामले में जजमेंट दे सकती है...!
स्टेच्यूरी या वैधानिक लॉज
ये कानून केंद्र सरकार द्वारा संसद में, राज्य सरकार द्वारा विधानसभा में और छोटे निकायों द्वारा निगम में बनाए जाते हैं
ऑर्डिनेंस या अध्यादेश
ये कानून राष्ट्रपति द्वारा बनाए जाते हैं, ये बहुत जरूरी मामलों में बनाए जाते हैं जब संसद सेशन में नहीं होती... ये भी बाकी लॉज की तरह या अधिनियम की तरह प्रभावी होते हैं... ऐसे कानूनों को संसद के दोनो में 6 महीने में अप्रूवल की आवश्यकता होती है.
ये आर्टिकल भारतीय न्याय व्यवस्था के विषय पर था... इस आर्टिकल की सहायता से हम भारतीय संविधान का खाका समझ सकते हैं. आपको ये आर्टिकल कैसा लगा... कॉमेंट करके जरूर बताइए...!

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